कोरोना की नई दवा मोल्नुपिरावीर नहीं बनाना चाहती प्रदेश की कंपनियां

 


भोपाल । कोरोना की तीसरी लहर प्रदेश में दस्तक दे चुकी है। अब तक प्रदेश में कोरोना की नई दवा मोल्नुपिरावीर की उत्पादन नहीं हो रहा। मरीजों की बढ़ती संख्या के बीच भी दवा कंपनियों की रुचि इस दवा का उत्पादन करने में नहीं है। दरअसल दवा कंपनियां मान रही है कि प्रदेश और देश में दवा की ज्यादा जरुरत नहीं पड़ेगी। एक दवा कंपनी ने अनुमति मांगी तो है लेकिन वह भी दवा का उत्पादन निर्यात के लिए करेगी। बाजार में भी फिलहाल दवा की मांग न के बराबर है।
बीते वर्ष कोरोना की दूसरी लहर के दौरान इंदौर और पूरे प्रदेश में आक्सीजन और जरुरी दवा-इंजेक्शन की खांसी किल्लत देखने को मिली थी। काफी समय बाद जरुरी दवाओं का प्रबंध करने के लिए प्रदेश सरकार ने फेबिपिरावीर टेबलेट और पोसाकोनाजोल इंजेक्शन के निर्माण की अनुमति इंदौर की दवा कंपनियों को दी थी। मई 2021 में इंदौर में दवाओं का उत्पादन शुरू हुआ। यहां से अन्य प्रदेशों में भी दवा भेजी जा सकी। कोरोना के ताजा दौर के पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन और सरकार ने उपचार के नए निर्देश जारी किए हैं। उपचार में काम आने वाली मोल्नुपिरावीर नामक दवा चार जनवरी को देश में लांच हो चुकी है। फिलहाल इस दवा का उत्पादन हैदराबाद, दिल्ली और मुंबई की कुछ बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां कर रही है। दवा बनाने के लिए कच्चा माल आपूर्ति करने वाले बेसिक ड्रग डीलर्स एसोसिएशन ने बीते दिनों प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर दवा निर्माण की अनुमति प्रदेश की कंपनियों को देने की मांग की। हालांकि दवा निर्माता कंपनियां ही बेसिक ड्रग डीलर्स एसोसिएशन की मांग के इत्तेफाक नहीं रख रही। इंदौर की एक दवा कंपनी ने मोल्नुपिरावीर के निर्माण की अनुमति मांगी तो है लेकिन सिर्फ निर्यात के लिए।
मांग नहीं तो खर्च क्यों
किसी भी नई दवा के निर्माण के लिए लायसेंस दिल्ली से ही जारी होता है। कोरोना के दूसरे दौर में तमाम जरुरी दवाओं को निर्माण करने वाली कंपनी के डायरेक्टर अभिजीत मोतिवाले के अनुसार मोल्नुपिरावीर नई दवा है इसलिए केंद्रीय एफडीए ही इसके निर्माण की अनुमति देगा। बीते वर्ष ऐन वक्त पर कोरोना में दवा उत्पादन करने वाले कई निर्माताओं को अच्छा खासा घाटा उठाना पड़ा, क्योंकि दवा का निर्माण शुरू होने बाद उसकी मांग घट गई ऐसे में लाइसेंस से लेकर उत्पादन यूनिट व कच्चे माल पर खर्च भी उन पर भारी पड़ा। उस दौर में क्योंकि लोगों को परेशानी ज्यादा थी इसलिए हम जैसे कुछ निर्माताओं ने बिना व्यापारिक जोड़-घटाव किए उत्पादन व आपूर्ति की। इस साल कोरोना के प्रकोप से अस्पताल में भर्ती होने व गंभीरता की स्थिति दिख नहीं रही। ऐसे में कोई भी स्थानीय निर्माता दो लाख रुपये की फीस देकर ऐसा ड्रग लायसेंस नहीं लेना चाहेगा जिसकी मांग नजर नहीं आ रही।

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