कोरोना ने एएसआई को दिए कई दर्द,छड़ी के सहारे चलने पर कर दिया मजबूर, आंखों में भी मोतियाबिंद

 भीलवाड़ा (प्रेमकुमार गढ़वाल)। कोरोना वॉरियर भी कोरोना के कहर से नहीं बच पाए।  इस संक्रमण ने आठ महीने पहले तक सामान्य जीवन जी रहे एक एएसआई को संक्रमित होने के बाद एक -एक कर कई बीमारियों ने झकड़ लिया। कोरोना के ही दुष्प्रभाव है कि आज ये एएसआई छड़ी के सहारे चलने को मजबूर है।   कोरोना को लेकर लापरवाही बरतने वाले लोगों के लिए यह खबर एक सबक हो सकती है लेकिन एक एएसआई को जिस प्रकार जीवन गुजारना पड़ रहा है उसे कोरोना के पोस्टपोंड दुष्प्रभावों का परिणाम कहा जा सकता है।
हम बात कर रहे हैं प्रताप नगर थाने के तत्कालीन सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) नवरतन दाधीच की। दाधीच ने भीलवाड़ा हलचल को अपनी पीड़ा बयां करते हुए बताया कि फरवरी 2021 में उन्हें कोरोना वैक्सीन की पहली डोज लगाई गई थी। महीने भर बाद दूसरी डोज लगी, तब तक सब कुछ सामान्य था। इसके बाद उन्हें एक मई को बुखार आया, इस दौरान आरटीओ ऑफिस के बाहर वे कोरोना ड्यूटी पर तैनात थे। उन्होंने यह बात अपने थाने में बताई तो उन्हें महात्मा गांधी अस्पताल भेजा गया। कोविड जांच कराने पर वे पॉजिटिव पाए गए। इसके बाद उन्हें होम क्वारंटाइन कर दिया गया।

आइसोलेशन के दौरान कम हुआ ऑक्सीजन लेवल 
होम क्वारंटाइन रहने के दौरान दाधीच का ऑक्सीजन लेवल कम हो गया और उन्हें सांस लेने में तकलीफ  होने लगी। उनके बच्चे ने उन्हें प्राइवेट एंबुलेंस से महात्मा गांधी अस्पताल पहुंचाया जहां उनकी जांच की गई तो ऑक्सीजन लेवल 60 पाया गया। अस्पताल में बेड खाली नहीं होने से उन्हें वहां भर्ती नहीं किया गया और ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था करने की बात कहकर घर भेज दिया गया। अब समस्या आई ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था करने की। सिलेंडर कहीं नहीं मिल रहा था। उधर दाधीच की तकलीफ बढ़ती जा रही थी। इस पर उनके बेटे ने न्यायिक अधिकारी के बेटे को जो उनके दोस्त थे, को कहकर सिलेंडर की व्यवस्था करवाई लेकिन ऑक्सीजन मास्क नहीं मिला। इस पर काफी भागदौड़ के बाद बागौर से ऑक्सीजन मास्क की व्यवस्था हो पाई। दाधीच ने बताया कि उन्हें तीन ऑक्सीजन सिलेंडर लगाए गए जिससे उनकी जान बच पाई।

घर पर ली दवा, स्वस्थ भी हुए, जांच में फिर निकले पॉजिटिव
दाधीच ने बताया कि वे महात्मा गांधी अस्पताल के डॉ. दौलतराम मीणा की प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर घर पर ही दवा ले रहे थे। स्वस्थ होने के बाद 18 मई को कोविड जांच कराई तो फिर पॉजिटिव पाए गए। ऐसे में उनकी व परिजनों की चिंता बढ़ गई। हालांकि इस बार उन्हें ऑक्सीजन की कमी का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन कोरोना का भय लगातार था। फिर डॉक्टर ने दवाई दी और वे लेते रहे।

दोनों हिप्स में बंद हुआ ब्लड सर्कुलेशन  
दाधीच लगातार बेड रेस्ट पर थे। इसी दौरान पोस्ट कोविड समस्या हो गई। उनके दोनों हिप्स में ब्लड सर्कुलेशन बंद हो गया। एमआरआई कराई तो पाया कि उनके दायें हिप में 50 और बायें हिप में 20 प्रतिशत लॉस हो गया। इसके बाद उन्हें जयपुर रेफर किया गया। उन्होंने भीलवाड़ा के निजी अस्पताल के डॉक्टर से संपर्क किया जिन्होंने दवा दी लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद वे अहमदाबाद गए और उस्मानपुरा स्थित निजी  हॉस्पिटल के डॉ. मुकेश शाह से ऑपरेशन करवाया। ऑपरेशन के बाद आराम मिला वे वापस भीलवाड़ा आ गए।

आठ दिसंबर को मेडिकल बोर्ड बैठाया तो जॉइनिंग मिली
ऑपरेशन कराने के बाद दाधीच भीलवाड़ा लौटे और आराम मिलने पर उन्होंने मेडिकल बोर्ड से गुजारिश की तो उन्होंने जांच करने के बाद विभाग को उनके फिट होने की बात कही। इस पर विभाग ने उन्हें क्लीन चिट देते हुए पुलिस लाइन में तैनाती दी। तब से अब तक दाधीच पुलिस लाइन में ड्यूटी बजा रहे हैं।

 अब दोनों आंखों में हो गया मोतियाबिंद 
दाधीच की परेशानियों का अंत यहीं नहीं हुआ। एक ओर समस्या उनके सामने मुंहबायें खड़ी थी। हिप्स की बाइपास सर्जरी कराने के बाद उनकी दोनों आंखों में मोतियाबिंद हो गया। भीलवाड़ा, अजमेर और जयपुर में नेत्र चिकित्सकों ने उनकी जांच करने के बाद इसकी पुष्टि कर दी और ऑपरेशन की सलाह दी। दाधीच ने बताया कि उनके आरटीजीएस में कटौती नहीं होने व अब तक सैलरी नहीं बन पाने से वे आंखों का ऑपरेशन कराने में सक्षम नहीं हैं।

अब छड़ी बन गई जीवन का हिस्सा
पुलिस लाइन में ड्यूटी कर रहे दाधीच अब छड़ी का सहारा लेने को मजबूर हैं। वे बिना छड़ी चलने-फिरने में सक्षम नहीं हैं। उन्होंने बताया कि अब छड़ी के सहारे वे ड्यूटी कर रहे हैं। छड़ी अब उनके जीवन का हिस्सा बन गई है।

मौत के मुंह से निकलकर आया, दूसरे भी ले सबक
दाधीच ने भीलवाड़ा हलचल को बताया कि कोरोना संक्रमित होने के समय उन्हें इतनी तकलीफ नहीं हुई जितनी पोस्ट कोविड समस्याओं के कारण हुई। उन्होंने कहा कि कोरोना को लेकर भीलवाड़ा के लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है। वे एक तरह से मौत के मुंह से निकलकर आए हैं और आज भी सामान्य जीवन नहीं जी पा रहे हैं। आठ महीने उनकी जिंदगी के सबसे खराब कहे जा सकते हैं जिसमें वे लाचार हो गए। जीने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा।


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