श्रीनगर में मौसम की सबसे ठंडी रात दर्ज की गई, 21 से होगी चिल्लई कलां की शुरूआत



श्रीनगर | कश्मीर में नल का पानी भी जमने लगा है। शनिवार सुबह जब लोगों ने अपने घरों के नल पानी भरने के लिए खोले तो उनमें पानी जम चुका था। उन्हें डी-फ्रीज करने के लिए लोग चारों ओर छोटी आग जलाते हुए देखे गए। यही नहीं शून्य से नीचे चल रहे तापमान के कारण सड़क पर जमी ओस की बूंदे भी जम गई हैं। ऐसे में सड़कों पर फिसलन हो गई है, जिसकी वजह से अधिकांश स्थानीय लोग सड़कों पर भी नहीं उतरे। ठिठुरन ने कश्मीर घाटी को अपनी चपेट में ले लिया है।

एक बार फिर शनिवार को शून्य से 6.6 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान रहने की वजह से श्रीनगर में मौसम की अब तक की सबसे ठंडी रात दर्ज की गई। मौसम विभाग के अनुसार इस सीजन में यह श्रीनगर में अब तक का सबसे ठंडा रिकॉर्ड है। इससे पहले करीब दस साल पहने यानी 25 दिसंबर 2018 को श्रीनगर में न्यूनतम तापमान शून्य से 7.7 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया था।

वहीं केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के द्रास शहर में तापमान -29 तक पहुंच गया है। मौसम विभाग के अनुसार जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में न्यूनतम तापमान सबसे कम दर्ज किया गया है। गुलमर्ग में रात का न्यूनतम तापमान -9.2, पहलगाम में -9.5 दर्ज किया गया। वहीं लेह शहर में न्यूनतम तापमान -18.3, कारगिल में -21.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। वहीं जम्मू शहर में 3.3, कटरा में 4.9, बटोत में 2.5, बनिहाल में 3.2 और भद्रवाह में न्यूनतम तापमान 3.0 दर्ज किया गया।

घाटी में कठोर सर्दी की शुरूआत हो चुकी है। 21 दिसंबर से 'चिल्लई कलां' की शुरूआत होगी जो 31 जनवरी तक चलेगा। 40 दिनों की कठोर सर्दियों को स्थानीय स्तर पर 'चिल्लई कलां' के नाम से जाना जाता है। यानी सोमवार सुबह जब कश्मीर में लोग घरों के किवाड़ खोलेंगे तो 'चिल्लई कलां' दस्तक दे चुका होगा। चिल्लई कलां के साथ दिन का अधिकतम तापमान गिरना शुरू होगा। वादी में लोगों की दिनचर्या, खान-पान व पहनावा में बदलाव आएगा। नदी-नालों में पानी जमा जाएगा। 

क्या होता है चिल्लई कलां

कश्मीर में सर्दियों के तीन परंपरागत मौसम हैं, जिनमें सबसे ज्यादा भीषण ठंड वाला 40 दिन का चिल्ले कलां है। इसके बाद चिल्ले खुर्द और चिल्ल बाईच आते हैं। चिल्ले कलां मूलत: फारसी भाषा का शब्द है। चिल्ला चालीस दिन और कलां का मतलब बड़ा। सदियों के सबसे ठंडे 40 दिन। पहले इस मौसम को कश्मीर में शिशिर मास कहा जाता था, लेकिन इस्लाम के कश्मीर में आने और फारसी का प्रभाव बढ़ने के साथ शिशिर मास धीरे-धीरे चिल्लई कलां हो गया। चिल्लई कलां 21 दिसंबर से जनवरी के अंत तक चलता है।