युवा पीढ़ी ने कोरोना से यह सीख जरूर ली होगी की खाना बाजार से नहीं खेती से आता है 

 

 खटवाडा  कैलाश सुखवाल/ अपनों  की पहचान विपत्ति के समय ही होती है. ऐसे में कोरोना वायरस हमारे लिए एक मौका बनकर आया है, इस समय हम अपने हितैषियों की सही पहचान कर सकते हैं. व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ये समय बदलती वफ़ादारियों और मजबूत होते रिश्तों का गवाह रहेगा. पर जो सबसे बड़ी सीख हमें मिली, वो हमारी जरूरतों से जुड़ी हुई है 


कोरोना वायरस ने आज पूरी दुनिया  को अपने आगे झुका कर रख दिया है पर इस समय  इंसान को अपनी जरूरतों  को प्राथमिकता के आधार पर  बांटी जा सकती हैं, जिनमें सबसे पहले इंसान की मूल जरूरतें यानी ऑक्सीजन, भोजन, पानी, नींद,  शामिल हैं. इसके बाद सुरक्षा, फिर प्रेम, फिर महत्त्वाकांक्षा और सबसे अंत में आध्यात्म आता है. कोरोना के इस काल में   इसी दौर में हमने सीखा अभी जूरी यदु को है कि हमारी मूल जरूरत अन्न है न कि आईफोन. हमारी आमदनी का बड़ा हिस्सा दिखावे और बुरी लतों पर खर्च होता रहा है, जबकि इन्हीं के चलते पूरी दुनिया पर्यावरण की समस्याओं से जूझ रही है. ऐसे में जो एक बड़ा निष्कर्ष हमने पाया है, वो ये है कि मजे में वे लोग हैं, जिनकी जरूरतें कम हैं. इन कठिनाइयों के चलते ही युवा पीढ़ी और बच्चों को ये समझ आया है कि खाना बाजार से नहीं, खेतों से आता है. बाज़ार में खाना बिकता है, पैदा नहीं होता.और असल उत्पादक दरअसल किसान हैं, जिनकी आत्महत्या और मौत की खबरें अखबारों के आठवें पेज पर छपती रही हैं. इस कोरोना काल में जहां एक तरफ मजदूरों ने मजबूरी और समस्याओं के चलते भूखे पेट सैकड़ों-हज़ारों किलोमीटर की पैदल यात्राएं कीं, वहीं एक अदने से जीव(वायरस) ने प्रकृति के सम्मुख हमें हमारी लघुता का बोध करा दिया. यानी न हम शारीरिक रूप से उतने कमजोर और अक्षम हैं, जितना हमें लगता था, न ही तकनीकी रूप से उतने शक्तिशाली जिसका हमें गुमान था.


ऐसे में ये वक़्त है जब हमें अपनी क्षमताओं के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत है. भूख-प्यास और गरीबी की मार झेलते मजदूरों का शहरों से पैदल मार्च, ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि शहरों की चमक-दमक महज दिखावा है, और असल में शहरी नागरिक चवन्नियों का गुलाम है. जिन शहरों को इन मजदूरों ने पने पसीने से गारा बनाकर खड़ा किया, वही शहर इन मजदूरों को बुरे वक्त में दो वक्त की रोटी और छत नहीं दे सके.


शहरों ने ज़ाहिर कर दिया कि मजदूर शहरों में हिस्सेदार नहीं हैं. ज़ाहिर हुआ है कि शहर आज भी गांवों के लिए परजीवी की तरह हैं, जो गांवों के संसाधनों पर गुजर-बसर करते हैं. विचारणीय यह भी है कि हमारी मूल आवश्यकताओं का शायद ही कोई हिस्सा है, जिसका उत्पादन शहर करते हैं. अन्यथा अनाज, दूध और सभी खाद्य पदार्थों से लेकर मानव संसाधन और साफ हवा-पानी तक, सभी के लिए शहर गांवों पर ही निर्भर हैं. लेकिन बदले में शहरों ने गांवों को सिवाय दिखावे और बुरी लतों के गिनी-चुनी उपयोगी चीजें ही दीं हैं.


निष्कर्ष ये है कि शहरों के लिए गांव वैसे ही हैं जैसे शहरी बाबू के लिए ग्रामीण मजदूर. इसके अतिरिक्त ऐसे तमाम निष्कर्षों का ज़िक्र अभी बाकी है, जो हमें इस लॉक डाउन में मिले.. मसलन, खाना बनाना एक लिंग निरपेक्ष कार्य है. जरूरी नहीं कि खाना सिर्फ औरतें ही बनाएँ. साथ ही हमने जाना कि हमारे असली नायक फिल्मस्टार और फुटबॉलर नहीं बल्कि स्वास्थ्यकर्मी और सुरक्षाकर्मी हैं, जिन्हें हमने हमेशा ही सुविधाओं और सम्मान के मामले में हाशिये पर रखा है.


साथ ही अब हम समझ चुके हैं कि यूरोप घूमने जाना अब न ही बहुत 'कूल' है, न ही यूरोप के सभी लोग समझदार ही होते हैं. इस बात की भी पूरी संभावना है कि अब अमेरिका की विश्व चौधरी की पगड़ी उतर जाएगी.. और शायद हम ये भी समझ सकें कि रेडियो में कर्फ्यू सुनना, और कर्फ्यू झेलना, दो अलग-अलग बातें हैं.


कुछ अन्य निष्कर्ष ये हैं कि हम जंक फूड और परमाणु हथियारों की होड़ के बिना भी जीवित रह सकते हैं. साथ ही 'वर्क फ्रॉम होम' का कल्चर काफी हद तक सफल है, और यही हमारे वर्क कल्चर का संभावित भविष्य भी है. पर भारत के लिए इस महामारी ने एक अलग किस्म का संदेश और निष्कर्ष दिया है; और वो ये है कि हमें मंदिरों-मस्जिदों से ज्यादा,  अस्पतालों, स्कूलों, स्वास्थ्यकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों और शिक्षकों की जरूरत है ।



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