जीवन की राह

 


बचपन संपूर्ण मानव जीवन का सबसे बेफिक्र लम्हा होता है। हमारा परिवार किन-किन कठिनाइयों से गुजर रहा है, कितनी खुशहाली है हमारे परिवार में, इस बात से बचपन को कोई मतलब नहीं होता। बस उसका मकसद ही अपने आप में मस्त रहना है। लेकिन ज्यों-ज्यों हमारी उम्र बढ़ती जाती है, हमें अपने ऊपर एक बोझ महसूस होने लगता है या यों कहें कि उम्र ढलने के साथ ही जिम्मेदारियां हमारे ऊपर हावी हो जाती हैं। ये जिम्मेदारी और भी दवाब तब डाल देती है, जब कोई व्यक्ति खासकर मध्यम वर्ग से आता है। उम्र ढलने के साथ ही हम खुशी में दिल खोल कर खुश नहीं हो सकते, हमारी कोई मामूली गलती भी अपराध कहलाने लगती है। हम किसी के आगे खुल कर रो भी नहीं सकते, क्योंकि ऐसा करने से हम कमजोर की श्रेणी में मान लिए जाएंगे।

उम्र ढलने के साथ ही खुद के परिवार से ज्यादा दबाव समाज का होता है। अगर किसी ने उम्र ढलने के साथ कुछ सफलता हासिल नहीं की हो तो समाज का दबाव उसे सहज नहीं रहने नहीं देता। इसलिए जिंदगी जीने की तलाश में लोगों को परिवार के मोह का त्याग करना पड़ता है। जिन गलियों में हमने बचपन गुजारा, उसे छोड़ना पड़ता है। बचपन के वे यार, जिनके साथ हमने यौवन तक का सफर तय किया, उसे भी त्यागना पड़ता है। यह जरूरी भी है अपने भविष्य को निखारने के लिए। यौवन अवस्था वही उम्र है, जिसमें हमें कुछ बेहतर कर अपने मां-बाप और परिवार को एक अच्छी जिंदगी दे सकते है। उम्र लंबी होती है और इसे हमें चलाना पड़ता है।

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