Monday, January 25, 2021

भारत-चीन के बीच चली 16 घंटे तक मैराथन वार्ता

 


नई दिल्ली। भारत और चीन ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सीमा विवाद सुलझाने और जवानों की संख्या कम करने के मुद्दे पर 16 घंटे लंबी मैराथन सैन्य वार्ता की। बैठक का विवरण अभी तक ज्ञात नहीं है। यह जानकारी सोमवार को अधिकारियों ने दी। पिछले दो महीने में हुई अंतिम वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच नौवीं कॉर्प्स कमांडर स्तर की वार्ता मोल्दो मीटिंग प्वॉइंट पर हुई।

यह बैठक रविवार को सुबह 10.30 बजे शुरू हुई और सोमवार को देर रात 2.30 बजे समाप्त हुई। लेह स्थित मुख्यालय 14 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल पी.जी. के. मेनन ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। बैठक में भारत ने विवादित क्षेत्रों को पूरी तरह स्वतंत्र करने और सुरक्षा बलों को वापस बुलाने की मांग की है।

सैन्य कमांडरों ने बैठक का विवरण प्रधानमंत्री कार्यालय को दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि भी बातचीत का हिस्सा थे। कोर कमांडर स्तर की आठवीं वार्ता 6 नवंबर को हुई थी। हालांकि वार्ता के बाद गतिरोध जारी रहा, दोनों देशों ने सैन्य और राजनयिक चैनलों के माध्यम से बातचीत और संचार बनाए रखने के लिए सहमति व्यक्त की थी।

भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने इस महीने की शुरूआत में कहा था कि सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर लंबे गतिरोध के लिए तैयार है, लेकिन साथ ही चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ उनके नौ महीने के लंबे संघर्ष के सौहार्दपूर्ण समाधान की उम्मीद भी जताई थी।

जनरल नरवणे ने कहा, "हम अपनी जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। हम अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों और राष्ट्र हितों को हासिल करने में लगे हैं।" चूंकि सैनिकों की संख्या में कोई कमी नहीं हुई, इसलिए दोनों देशों के सैनिक माइनस 20 डिग्री सेल्सियस में बने रहने के लिए मजबूर हैं।

भारत ने 30 अगस्त को रेचिन ला, रेजांगला, मुकर्पी, और टेबलटॉप जैसे दक्षिणी तट पर पैंगोंग झील के महत्वपूर्ण पहाड़ी ऊंचाइयों पर कब्जा कर लिया था, जो अब तक मानव रहित थे। भारत ने ब्लैकटॉप के पास भी कुछ तैनाती की थी। चीन द्वारा उकसाऊ गतिविधियों के बाद यह कदम उठाया गया था।

अब इन 13 चोटियों से भारत चीनी नियंत्रण के स्पैंगर गैप और साथ ही चीनी सीमा पर मोल्डो गैरीसन पर निगरानी रख सकता है। गलवान घाटी में दोनों पक्षों के बीच पिछले साल हुई हिंसा में भारत ने अपने 20 सैनिकों को खो दिया था, जबकि मरने वाले चीनी सैनिकों की संख्या अज्ञात है।
 

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