संसार से मुक्त होने के लिए स्वयं को ही प्रयास करना होगा-विद्यासागर महाराज

 


भीलवाड़ा ! संसार का हर प्राणी सुखी होना चाहता है, कोई नही चाहता उसे दुःख मिले। लेकिन दुःख है क्या, संसार  में विभिन्न तरह के संकट, भूख-प्यास, धन का अभाव, बीमारी आदि को ही मानव दुःख समझता है, यही तो मिथ्या धारणा है। यह तो बाह्य दुःख है, जो कि पूर्व कर्मो के संयोग से मिलते है। वास्तविक दुःख तो आत्मा में उत्पन्न व्याकूलता है। प्राणी को यह समझ में आ जाए कि इन सांसारिक दुःखों का कारण मैं स्वयं हूँ, तो आत्मा निराकुल हो जाएगी। सांसारिक दुःख सब तुच्छ लगने लगेगे। यह बात बालयति निर्यापक मुनि विद्यासागर महाराज ने शुक्रवार को सुधासागर निलय में आचार्य गुणभद्र स्वामी रचित ग्रंथ आत्मानुशासन पर प्रवचन के दौरान कही।
मुनिश्री ने कहाकि यह संसार ही दुःख है। इससे मुक्त होना ही वास्तविक सुख है। संसार से मुक्त होने के लिए स्वयं को ही प्रयास करना होगा, भगवान उसमें कुछ करने वाले नही है, वे तो मात्र मार्गदर्शक है। भगवान की पूजा, भगवान के जैसा बनने के लिए की जाती है, लेकिन आज का श्रावक तो मात्र पुजारी बनकर रह गया है, वह तो भगवान द्वारा बताये गये संयम के पथ कदम ही नही रखना चाहता।
उन्होंने कहाकि जिस प्रकार से रोगी को स्वस्थ करने के लिए कड़वी दवा ही दी जाती है, उसी प्रकार आत्मा के कल्याण के लिए, तप, संयम, साधना को कड़वी दवाई समझना चाहिए। इन्हें ग्रहण करके ही आम श्रावक धीरे-धीरे मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
आर के कॉलोनी स्थित श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष नरेश गोधा ने बताया कि प्रतिदिन प्रातः 8.30 बजे मुनिश्री के प्रवचन, दिन में 3 बजे तत्वार्थ सूत्र पर वाचन, संध्या 6.30 बजे आरती के बाद जिज्ञासा समाधान एवं आनन्द यात्रा के कार्यक्रम होते है। समाज का युवा वर्ग बडी संख्या में इन कार्यक्रमों में भाग ले रहा है।
सचिव अजय बाकलीवाल ने बताया कि शुक्रवार सायं आनन्द यात्रा के बाद नेमीचन्द एवं चन्दा जैन परिवार की ओर से चातुर्मास मुख्य कलश स्थापना के उपलक्ष में सुधासागर निलय में विनतियां एवं भजन कार्यक्रम आयोजित किये गये।

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