दुर्गा जब दैत्य प्रकृति वाले दुर्जनों का संहार करना चाहती हैं तो अपनी माया शक्ति से दुर्जनों को मुग्ध कर लेती हैं

भीलवाड़ा हलचल। हरी शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम उदासीन के सानिध्य में विभिन्न आध्यात्मिक एवं धार्मिक अनुष्ठान चल रहे हैं। प्रातःकालीन कथा सत्र में पाक्षिक महाशक्ति लीला कथा में व्यासपीठ से कथा-प्रवक्ता स्वामी योगेश्वरानंद ने कहा कि महाशक्ति भगवती दुर्गा जब दैत्य प्रकृति वाले दुर्जनों का संहार करना चाहती हैं तो अपनी माया शक्ति से दुर्जनों को मुग्ध कर लेती हैं जिससे मरणशील व्यक्ति की बुद्धि उन्हीं क्रिया कलापों को करना प्रारम्भ करने लगती है जो मुमूर्षू को उसकी मृत्यु तक पहुँचाने में परम सहायक बनते हैं। इसके ठीक विपरीत जिनके जीवन की रक्षा करना चाहती हैं उनकी बुद्धि को सनातन धर्म और शास्त्रीय रीति से जीवन निर्वाह की प्रेरणा दे देती हैं। मधु-कैटभ को भगवती पराशक्ति दुर्गा का यह वरदान प्राप्त था कि वे दोनों जब तक मरना न चाहें तब तक मर नहीं सकते थे इस कारण वे दोनों मदोन्मत्त होकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को ही समाप्त करने के लिए आक्रमण कर दिये। ब्रह्मा जी ने अपनी रक्षा के लिए भगवान् विष्णु की शरण ली किन्तु विष्णु स्वयं योग निद्रा भगवती के द्वारा दीर्घ निद्रा में जा चुकने से कुछ नहीं कर पाये। ब्रह्मा जी ने महाशक्ति दुर्गा का योगनिद्रा के रूप में स्मरण करते हुए विष्णु को  मुक्त करने की प्रार्थना की। भगवती निद्रा ने विष्णु के शरीर को छोडकर उसे जागृत किया तथा मलिधु-कैटभ का वध करने के ए प्रेरित किया। भगवती की प्रेरणा से मधु-कैटभ ने भी विष्णु के साथ लंबी अवधि  तक युद्ध किया और विष्णु के हाथों से मृत्यु को प्राप्त हुए। पंचम दिवस की देवी स्कन्ध माता के आकर्षक स्वरूप में दर्शन हुए। वैदिक मंत्रोचार के साथ हुए हवन में संत मयाराम, संत राजाराम, संत गोविंदराम, अशोक मूंदड़ा, लक्ष्मीनारायण खटवानी एवं अन्य श्रद्धालुओं ने आहुतियां दी।


 


सायंकालीन कथा सत्र में 45 दिवसीय श्रीमद भागवत महाकथा के आज 34वें दिन की कथा का वाचन और प्रवचन करते हुए व्यासपीठ से स्वामीजी ने कहा कि लीला पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ने अनासक्त भाव से प्रवृत्ति धर्म को स्वीकार करके मानवमात्र को आदर्श गृहस्थ की भाँति उत्तम जीवन जीने की कला सिखाई। उन्होंने 16108 पत्नियों और उनके पुत्र-पौत्रों से परिपूर्ण कुटुम्ब को अकेले ही पालित-पोषित कर सुखी किया। इस लीला के द्वारा श्रीकृष्ण ने गृहस्थ जीवन को मुक्ति का द्वार सिद्ध किया। अन्त में समस्त पारिवारिक जीवन से विरक्त होकर मानव को अपने पारमार्थिक जीवन संवारने की लोकशिक्षा प्रदान की। राजा नृग के चरित्र से यह शिक्षा प्राप्त होती है कि परधन को अज्ञात रूप से स्वीकार कर लेने से भी अपराध होता है जिसका परिणाम नारकीय दुःखों की प्राप्ति है।


कथा विश्राम पश्चात विशनदास आहूजा, शक्ति मिश्रा, देवीदास गेहानी, चारु, आयुष नानकानी, कमल जोतवाणी,मुस्कान, इशिका, रौनक, उमेश बोहरा पूजा और चंद्रा बोहरा व अन्य ने व्यासपीठ का पूजन अर्चन एवं आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया।नवरात्रि उपासना महापर्व के उपलक्ष में रामलीला महोत्सव में आज जनक जी का संताप, लक्ष्मण जी का कोप, धनुष भंग, राम विवाह, लक्ष्मण परशुराम संवाद का आकर्षक एवं  भावपूर्ण मंचन बाहर से आए हुए कलाकारों द्वारा किया गया।


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