राज्य का एकमात्र शक्तिपीठ जहां नवरात्रा के नो दिन मां घटारानी के नहीं होते दर्शन, मंदिर के रहते हैं पट बंद

 


जहाजपुर। दिनेश पत्रिया भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर जहाजपुर तहसील से 10 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम दिशा में सुरमय पहाडीयो के बीचो बीच एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित प्राचीन घटारानी माता का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। वहां की ऐसी मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से मां के दरबार में पहुंचता है माता रानी उसकी हर मुराद पूरी करती है। इस मंदिर के बारे में लोगों की मान्यता है कि पुजारी शक्ति सिंह ने बताया कि चरवाहा घने जंगल में गाय लेकर चलाने के लिए जंगल आया करता था पहाड़ी के नीचे एक नदी होने से दोपहर का विश्राम वही करते और गाय भी वही पानी पीने आया करती थी। धार्मिक ग्रंथों और शोधकर्ताओं की मान्यताओं के अनुसार माता रानी ऊपर पहाड़ी से एक बालिका के रूप में आती और प्रतिदिन गायों का दूध पी जाती। यह सिलसिला कुछ दिनों तक लगातार चलता रहा। पशु मालिक गाय के दूध न पाकर गवाले पर भड़कते और उसे भला-बुरा कहते। 1 दिन वाले ने गायों की रखवाली करना शुरू किया और देखा कि एक छोटी सी बालिका नदी के किनारे आकर उनका दूध पी जाती। ग्वाले ने बालिका को रोकने का प्रयास किया लेकिन बालिका वाले को देख पहाड़ी की ओर भागने लगी बालिका पहाड़ी पर चढ़ने के बाद पहाड़ी में प्रवेश करने लगी इतने में बालिका की चोटी हाथ आ गई। उस समय से ही माता का सिर पहाड़ी पर है और धड़ जमीन के भीतर। यह देख चरवाहा हैरान रह गया और देखते ही देखते माता पहाड़ी पर प्रगट हो गई और चरवाहे को मनचाहा वर देते हुए कहा कि आज से मैं इसी पहाड़ी पर निवास करूंगी जो भी सच्चे मन से मुझे ध्यायेगा मैं उसकी मनोकामना पूर्ण करूंगी। तभी से माता घटारानी का मंदिर नदी किनारे स्थित पहाड़ी पर है। जिसकी पूजा अर्चना तवर परिवार करता हुआ आ रहा है। - संवत 1986 में हुआ मंदिर निर्माण पुजारी शक्ति सिंह ने बताया कि वर्ष 1986 में चंपाबाई लोहार माता की भक्ति किया करती थी, पुजारी के अनुसार 1986 में चंपाबाई ने तवर परिवार के बहादुर सिंह तवर को गोद लेने के पश्चात मंदिर का निर्माण कराया था। तभी से इस मंदिर में तवर परिवार से ही भोग बनकर आता है और माता को चढ़ाया जाता है और तवर परिवार ही माता मंदिर की सेवा पूजा करते हुए आ रहे हैं। - नवरात्रा में दर्शन नहीं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार साल में दो बार नवरात्रा होते हैं शारदीय व चेत्र माह के दोनों नवरात्रा कि हर अमावस्या पर घट स्थापना होने के साथ ही मां घटारानी मंदिर के पट भक्तों के दर्शनार्थ बंद कर दिए जाते हैं जो अष्टमी पर ही खोले जाते हैं। अष्टमी पर राज परिवार से भोग बंद कराने के पश्चात माता को लगाया जाता है और महाआरती के बाद माता मंदिर के पट भक्तों के दर्शनार्थ खोल दिए जाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि नवरात्रा में गर्भ ग्रह में माता स्वयंभू प्रकट होती है अर्थ गर्भ ग्रह को पवित्र रखा जाता है। अष्टमी पर ही महा आरती के पश्चात दिनभर भक्त माता के दर्शनों के लिए पैदल ही माता के जयकारों के साथ दरबार में पहुंचता है माता के दर्शनों के पश्चात भक्त दो दिवसीय मेले का लुफ्त उठाते हैं और मेले में खरीदारी करते हैं।

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