रक्षा के संकल्प के रुप में मनेगा रक्षाबंधन

 


भीलवाड़ा । सकल जैन समाज रविवार को मुनि विद्यासागर महाराज ससंघ के सानिध्य में ७०० मुनियों की रक्षा का पर्व, रक्षाबंधन, धर्म की रक्षा, धर्म के आयतनों की रक्षा के संकल्प के रुप में मनायेगा। इस अवसर पर ७०० मुनियों की मंत्रोचार से पूजा के साथ श्रीफल चढ़ाये जायेगें।

सोमवार से भाद्रपद माह में जैन समाज सोलह कारण, रत्नत्रय, दशलक्षण, पुष्पांजलि आदि पर्व मनाते हुए व्रत, उपवास, त्याग, संयम आदि को धारण करेगा। सोमवार से ३१ दिन तक चलने वाले सोलह कारण पर्व शुरू होगें। बालयोगी निर्यापक श्रमण मुनि विद्यासागर महाराज ने शनिवार को अपने प्रवचन में कहा कि सम्यक्त्व से युक्त व्रत, नियम, संयम आदि अमूल्य रत्नों के समान हो जाते है। इनसे आत्मा कांतिमय हो जाती है। रत्नत्रय रुपी औषधि अनेक भवों के पाप कर्मो को जड़ से उखाड़ देती है। उन्होंने कहाकि जीवन में भावनाओं का बहुत महत्व है। जैन ग्रंथों में कहा गया कि ज्ज्यद भाव्यते, तदभवतिज्ज्। मनुष्य जैसी भावना भाता है, वैसा बन जाता है। हमारे मन में सारे संसार के कल्याण की प्रगाढ़ भावना ही निर्मल सम्यक दर्शन का एक रुप है। ऐसी भावनाएं तीर्थंकर प्रकृति के बंध के कारण बनती है। वर्तमान समय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध नही होता है, लेकिन सम्यक्त्व सहित ऐसी भावनाओं से हमें भविष्य में तीर्थंकर भगवान का साक्षात सानिध्य मिल सकता है।

महाराज ने कहाकि सम्यकत्व की महिमा अवर्णणीय है, उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है। जिस प्रकार बिना दिशा सूचक यंत्र के हवाई जहाज नहीं चल सकता है, उसी प्रकार प्राणी के पास कितना ही वैभव हो, ज्ञान हो, बिना सम्यकत्व के वह व्यर्थ है। धर्म रुपी पेड़ भी सम्यक दर्शन की जड़ों के आधार पर लगता है।

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