धर्मसाधना कभी अमंगलकारी नहीं होती-- महासती विमलाकंवर

 


चित्तौड़गढ़ !  साधुमार्गी संघ की महासती शासनदीपिका  विमला कॅवरजी म.सा. ने  शनिवार को अरिहन्तभवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह आत्मा अनन्तकाल से संसार में परिभ्रमण कर रही है। जब तक आत्मा के साथ कर्म लगे हुए आत्मा को संसार में परिभ्रमण करना पड़ेगा, इसलिये आत्मा को  संसारीआत्मा  कहा जाता है। इस आत्मा से कर्मो का छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय पुण्यार्जन है। अतः पुण्यार्जन का सर्वाधिक महत्व है। कर्म निरन्तर बन्धते भी रहते है। केवल आपुस्य कर्म का एक बार बन्ध होता है। बाकी के कर्म तो अनवरत बन्धते रहते है। जब तक आत्मा के साथ लगे कर्म नही हटते पुण्यार्जन की आवश्यकता रहती है।
    आपने कहाकि संसार पुदगलों से भरा पड़ा है और इसी कारण यह पुदगल आत्मा के साथ जुड़कर कर्मबन्ध करते रहते है। आपने महाराज श्रेणिक का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहाकि धर्म क्रिया हमेशा मंगलकारी होती है। धर्मसाधना कभी भी अमंगलकारी हो ही नही सकती। हम जिनवाणी का श्रवण करें उसे आत्मासात करें। जिनवाणी में अनेक महान आत्माओं का वर्णन हमें धर्मसाधना के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
    इससे पूर्व महासती सुमित्राश्रीजी म.सा. ने अपने उद्बोधन में प्रमाद नहीं करने और प्रमाद  किन कारणों से होता है, इस पर विस्तृत प्रकाश डाला और प्रमाद के कारण में पहला कारण मद बताया। मद अर्थात मद्यपान और अहंकार के कारण भी व्यक्ति प्रमाद करता है। मद्यपान की चर्चा में आपने बताया कि जिससे नशा आता है, व्यक्ति को भान नही रहता वह  मद्यपान है  जैसे  शराब, भांग, गांजा, अफीम, चरस आदि का सेवन, कभी-कभी अज्ञानतावश व्यक्ति सोचता है कि नशा करने से चिन्ताऐं दूर हो जाती है और तनाव कम हो जाता है। यह उसकी सही सोच नही है। क्षणभर के लिये चिन्ताऐं भले ही दूर हो जाय, मद्यपान जीवन को बर्बाद कर देता है। नशेड़ी व्यक्ति तन से मन से एवं धन से बर्बाद हो जाता है। मद्यपान करने वाला भले ही अपने आपको महान् समझे उसकी परिवार एवं समाज में कोई प्रतिष्ठा नही होती। मद्यपान से जीवन में अनेक बुराईयां आ जाती  है और मद्यपान के चंगुल में फंसकर अनमोल मनुष्य जन्म को बर्बाद कर देता है।
    आपने मद का दूसरा अर्थ अभिमान या अहंकार बताते हुए कहाकि अहंकार का नशा भी बड़ा हानि कारक है।  यह अहंकार चाहे धन का हो पद का रूप का हो बल का। सभी प्रकार का अहंकार अर्थात अभिमान अवनति के प्रवेश द्वार खोल देता है। यदि आप जीवन में महान् बनना चाहते है तो सर्वप्रथम अभिमान को तजों एवं विनम्र बनों। इसी अभिमान से जीवन प्रमादी बन जाता है। भगवान महावीर ने अपनी अन्तिम देशना उत्तराध्यन सूत्र में क्षणभर का भी प्रमाद नही करने का उद्बोधन दिया है।
    आपने कहाकि प्रमादी जीवन सद्गुणों का नाश कर दुर्गुणों में चला जाता है। जब दुर्गुण आ जाते है तो व्यक्ति अन्याय-अनीति-छल-कपट से धर्माजन करते भी नही सकुचाता और अनेक कष्टों को आमंत्रित कर लेता है। इतिहास साक्षी है, जिन्होने धन-बल-रूप पद का अभिमान किया उनका सर्वनाश हुआ है। कार्यक्रम का संचालन मंत्री विमलकुमार कोठारी ने  किया।

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