अब सांस के नमूने से पता चलेगा शरीर में एंटीबायोटिक का स्तर, जानें कैसे काम करेगा बायोसेंसर

 

बर्लिन (जर्मनी), एएनआइ। किसी भी संक्रमण से बचाव या उसके इलाज में एंटीबायोटिक की अहम भूमिका होती है। लेकिन उसकी उचित मात्रा का होना और भी जरूरी होता है, क्योंकि कम डोज होने से रोगाणुओं में दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित होने का खतरा होता है, जबकि अधिक डोज से दूसरे दुष्प्रभाव होते हैं। ऐसे में शरीर में एंटीबायोटिक के स्तर की जानकारी होने से इस समस्या का बहुत हद तक समाधान हो सकता है ।7

इस दिशा में यूनिवर्सिटी आफ फ्रीबर्ग के इंजीनियरों और बायोटेक्नोलाजिस्ट की एक टीम ने पहली बार यह प्रदर्शित किया है कि स्तनधारी प्राणियों में सांस के नमूने से शरीर में एंटीबायोटिक का स्तर मापा जा सकता है। यह अध्ययन 'एडवांस्ड मटैरियल्स' जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है इसके जरिये रक्त में एंटीबायोटिक कंसंट्रेशन (सांद्रता) का भी पता लगाया जा सकता है।शोधकर्ताओं की टीम ने इसके लिए एक बायोसेंसर बनाया है, जो मल्टीप्लेक्स चिप से बना है और एकसाथ कई नमूने में कई पदार्थो की जांच कर सकता है। यह बायोसेंसर सिंथेटिक प्रोटीन आधारित है, जो एंटीबायोटिक्स से प्रतिक्रिया कर करंट (प्रवाह) में बदलाव पैदा करता है। भविष्य में इस तरह की जांच का इस्तेमाल संक्रमण से लड़ने के लिए व्यक्ति विशेष के लिए दवा की डोज निर्धारित करने में किया जा सकता है। इससे बैक्टीरिया के प्रतिरोधी स्ट्रेन विकसित होने की जोखिम को कम किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने इस बायोसेंसर का परीक्षण एंटीबायोटिक्स दिए गए सुअरों के ब्लड, प्लाज्मा, यूरिन, स्लाइवा और सांस पर किया है। उन्होंने इस बायोसेंसर के परिणाम को प्लाज्मा पर उतना ही सटीक पाया गया, जितना कि मानक मेडिकल प्रयोगशाला प्रक्रिया में होता है। इसके पहले छोड़ी गई सांस के नमूने से एंटीबायोटिक का स्तर मापना संभव नहीं था।

शोधकर्ताओं की टीम के अगुआ डाक्टर कैन डिनर ने बताया कि अब तक सांस से सिर्फ एंटीबायोटिक्स की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता था। लेकिन हमारे माइक्रोफ्लूडिक चिप के जरिये सिंथेटिक प्रोटीन से हम सांस में न्यूनतम कंसंट्रेशन का भी पता लगा सकते हैं और उसे ब्लड वैल्यू के साथ जोड़ा जा सकता है।

इसलिए जरूरी है दवा की डोज तय करना

इलाज में डाक्टरों के लिए व्यक्ति विशेष के लिए एंटीबायोटिक्स का स्तर तय करना जरूरी होता है। इसका निर्धारण रोगी के घाव, आर्गन फेल्यर या मौत के जोखिम के आधार पर होता है। कम मात्रा में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल बैक्टीरिया को रूपांतरित (म्यूटेट) होने का मौका देता है, जिससे बैक्टीरिया दवा के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेता है और उस दवा का असर कम हो जाता है। एक अन्य शोधकर्ता एच सेरेन ऐटस ने बताया कि अस्पतालों में एंटीबायोटिक्स के स्तर की द्रुत या त्वरित निगरानी के बहुत सारे फायदे हैं। इस तरीके से जांच के लिए चिप को पारंपरिक मास्क में भी फिट किया जा सकता है

आगे की परियोजना

यूनिवर्सिटी आफ फ्रीबर्ग के डाक्टर डिनर एक अन्य परियोजना पर भी काम कर रहे हैं, जिसमें पहनने योग्य पेपर सेंसर विकसित किए जाने की कोशिश की जा रही है, ताकि छोड़ी जाने वाली सांस से बायोमार्कर का सतत मापन किया जा सके। इसके साथ ही इस बायोसेंसर के क्लिनिकल इस्तेमाल के लिए इंसानों पर भी ट्रायल की योजना है, ताकि इसकी उपयोगिता की पुष्टि की जा सके।

कैसे काम करता है बायोसेंसर

माइक्रोफ्लूडिक बायोसेंसर में मौजूद प्रोटीन पेनिसिलिन जैसे एंटीबायोटिक्स के बीटा-लैक्टम को पहचान सकता है। नमूने में एंटीबायोटिक तथा एंजाइम से जुड़ा बीटा लैक्टम में बैक्टीरियल प्रोटीन को बांधने की प्रतिस्पर्धा रहती है। इससे बैट्री की तरह करंट चेंज पैदा होता है। सैंपल में ज्यादा एंटीबायोटिक होने पर एंजाइम उत्पाद कम मात्रा में पैदा होता है, जिससे करंट का मापन किया जा सकता है। यह एक प्राकृतिक रिसेप्टर प्रोटीन आधारित प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल प्रतिरोधी बैक्टीरिया एंटीबायोटिक्स से होने वाले खतरे का पता लगाने के लिए करता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि हमने बैक्टीरिया को उसके ही खेल में मात दी है

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