क्रोध की शुरुआत अज्ञान से होती है और अन्त पश्चाताप से - विद्यासागर महाराज

 


भीलवाड़ाा । दशलक्षण पर्व के दौरान उपवास आदि तपों की साधना करने वालों के लिए प्रकृति भी सहायक हो रही है। अत्यन्त भीषण गर्मी के मध्यजहां वर्षा की समस्त आशाएं समाप्त हो गई थी वही शुक्रवार को हुई वर्षा ने वातावरण को शांत कर तपस्वियों को राहत दी। आर के कॉलोनी में ब्रह्मचारी महावीर भैयाममता शाहअंशुल शाह के सौलह कारण के सौलह उपवास की आराधना में आज पांचवा उपवास है। बालयति निर्यापक मुनि विद्यासागर महाराज ससंघ के सानिध्य में शांतिलाल चैनसुख शाह परिवार ने स्वर्ण कलश से आदिनाथ भगवान का प्रथम अभिषेक एवं 108 रिद्धी मंत्र से अभिषेक एवं स्वर्ण झारी से शांतिधारा की।

सौलह कारण भावना में अभिक्ष्ण संवेग भावना पर प्रवचन देते हुए बालयति निर्यापक मुनि विद्यासागर महाराज ने कहा कि संसार के ज्यादातर प्राणियों के पास आवेग अथवा क्रोध का भण्डार भरा होता हैइससे वह आवेश में आकर स्वयं का भी नुकसान कर बैठता है। क्रोध की शुरुआत अज्ञान से होती है और अन्त पश्चाताप से होता है। कषायों से रहित प्राणी निर्वेग होकर संवेग को धारण करता है। संवेग का अर्थ संसार के दुखों से भयभीत होता रहना एवं उससे मुक्त होने का प्रयास करने के लिए धर्म के प्रति परम उत्साह की भावना रखना है।

दशलक्षण के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर चर्चा करते हुए महाराज ने कहा कि सभी प्रर्यायों में श्रेष्ठ मानव पर्याय जो व्यक्ति को अपनी उपादान शक्ति से मिली हैउसका आनंद क्यों न लिया जाए। यह सम्पूर्ण आनन्द लेने के लिए ही आचार्य कुन्दकुन्द देव ने कहा कि ’’अर्हम् एको’ मैं एक हूँअपने आप में सम्पूर्ण हूँमैं दूसरे द्रव्यों की ओर देख ही नही रहा हूँ। महाराज ने कहा कि अगर अर्हम् के स्थान पर अहंकार आ जाएतो व्यक्ति ने दूसरों को तिरोहित करने का भाव पैदा हो जाता है। इसलिए बस सिर्फ अपनों की अनुभूति करो। मान उत्तम मार्दव धर्म का विपरीत है। मानी व्यक्ति दूसरों को ही नही कुचलताअंत में स्वयं भी मिट कर समाप्त हो जाता है। मंदिर के विशाल शिखर पर ध्वजा फहरा रही है लेकिन उसका आनन्द नींव का पत्थर ले रहा है कि यह ध्वजा मेरे उपर खडे होकर आकाश की ऊंचाइयों को छु रही है। नींव के पत्थर के समान दूसरों की ऊंचाईयों पर आनन्द मनाने वाले बिरले की होते है।

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