मैत्री भाव जगत में सब जीवों से नित्य रहे- विद्यासागर महाराज

 

भीलवाड़ा । ’’मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे’’ जब किसी व्यक्ति के मन में यह भाव अंकित हो जाता है तो वह सभी के प्रति विनम्रता का भाव रखता है। मारीच ही महावीर बनता है, महावीर ’’महावीर’’ नही बनता। यह समझते हुए सभी जीवों की आत्मा सिद्ध परमेष्ठी के समान है, यह मानना सबसे बढा विनय है। सभी के हित की भावना धारण करना, दूसरों के सम्मान को ठेस नहीं पहुँचाना सौलह कारण भावना में विनय सम्पन्नता भावना मानी जाती है। जैन दर्शन हर परिस्थिति में दूसरों के प्रति कोमल, मृदुभाव रखने की सीख देता है। आचार्यो ने कहा है कि जो झुकना नहीं जानता, वह पाषाण के स्तम्भ के समान है। हमें सिद्ध रूप प्राप्त करना है तो पहले अपने आप को बडा मानना छोडना होगा एवं दूसरों के प्रति विनय भाव धारण करना होगा। ’’जो मानते है स्वयं को बहुत बडे हैं, वे धर्म से अभी बहुत दूर खडे है’’। यह बात बालयति निर्यापक श्रमण मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने बुधवार को सुधासागर निलय में विनय सम्पन्न भावना पर प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहाकि साधु भी विनय तपाचार का पालन करता है, श्रावक महाराज के प्रति हाथ जोडकर विनय करते है, तो साधु का हाथ उठाकर आशीर्वाद देना विनय भाव है।
महाराज ने बताया कि बडों के साथ आदर सम्मान करना लौकिक विनय है। अलौकिक विनय मोक्ष मार्ग प्रशस्त करता है, इसके पांच भेद-दर्शन विनय, ज्ञान विनय, चारित्र विनय, तप विनय, उपचार विनय। सम्यक दृष्टि के कारणभूत देव, शास्त्र, गुरु के प्रति विनय रखना, सम्यक दृष्टि के गुणों की अनुमोदना करना दर्शन विनय है। शास्त्र, आगम, ज्ञानियों के प्रति विनय भाव ज्ञान विनय कहलाता है। विनम्रता रहित किताबी ज्ञान से व्यक्ति मात्र तोता बनता है, चारित्र का पालन करने वाले का सहयोग करना, अनुमोदना करना चारित्र विनय एवं तपस्वियों के तप की अनुमोदना एवं प्रभावना करना एवं उनसे प्रभावित होकर स्वयं तप के भाव करना तप विनय कहलाता है। अपने से ज्यादा संयमियों को तपस्वियों के लिए खड़ा होना, आसन देना, सम्मानपूर्वक विदा करना आदि उपचार विनय में आते है।

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