आंखों के लिए कैसे करें लेंस का चुनाव, कब बदलना चाहिए साथ ही साइड इफेक्ट्स, जानें सभी जरूरी बातें

 


आंखों से जुड़ी परेशानियां दूर करने के लिए आई ड्रॉप्स के अलावा चश्मा लगाने की सलाह भी एक्सपर्ट्स देते हैं। लेकिन कई लोग कंफर्ट की वजह से चश्मा नहीं लेंस लगाना प्रीफर करते हैं। वैसे भी मास्क के साथ चश्मा संभालना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। ऐसे में लेंस का ऑप्शन ही बेहतर है तो किस तरह का लेंस है कारगर, जानेंगे आज। 

कैसे करें लेंस का चुनाव

जिनकी दूर की नजर कमजोर होती है और जिन्हें चश्मा पहनना नापसंद है, उनके लिए कॉन्टैक्ट लेंस सही विकल्प साबित होता है। अगर आंखों में ड्राइनेस यानी सूखेपन की समस्या है तो सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस का चुनाव करना चाहिए। ये प्लास्टिक के बने होते हैं। आरामदायक होने के साथ ही कॉर्निया तक ऑक्सीजन पहुंचाने में भी मददगार होते हैं, लेकिन ऐसे लेंस को महीने में एक बार बदलना जरूरी होता है।

जीपी/आरपीसी लेंस

इसका पूरा नाम रिजिड गैस परमिएबल लेंस है। ये सॉफ्ट लेंस की तुलना में थोड़े सख्त होते हैं। इनमें विज़न अधिक साफ होता है। इनकी देखभाल भी आसान होती है। जिनकी दृष्टि ज्यादा कमजोर हो या जो लोग अधिक व्यस्त रहते हैं, उनके लिए ऐसे कॉन्टैक्ट लेंस उपयुक्त होते हैं।

जिन्हें पास और दूर की चीज़ें देखने में ज्यादा दिक्कत होती है, उन्हें बाइफोकल या प्रोग्रेसिव लेंस का उपयोग करना चाहिए।

जिन्हें नजर के धुंधलेपन के साथ सिरदर्द जैसी समस्याएं हों, उनके लिए टोरिक लेंस उपयुक्त रहता है।

जिनकी कॉर्निया सही शेप में नहीं होती या जिनके चश्मे का पावर बहुत ज्यादा है, उनके लिए सेमी टॉक्स लेंस बेहतर विकल्प है.

कब बदलें लेंस

जो लोग कॉन्टैक्स लेंस का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें डॉक्टर से सलाह के बाद हर छह माह के अंतराल लेंस बदलते रहना चाहिए।

लेंस के साइड इफेक्ट

एलर्जी

सही तरीके से लेंस नहीं लगाने पर आंखों में लाली और खुजली की समस्या हो सकती है। ऐसे लक्षण दिखने पर कॉन्टैक्ट लेंस न लगाएं और डॉक्टर से सलाह लें।

कॉर्निया पर खरोंच

लेंस पहनते और उतारते समय ध्यान रखें कि कॉर्निया पर कोई खरोंच न लगे। ऐसा होने पर कॉर्नियल अल्सर का डर रहता है।

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