उत्तम शौच धर्म की आराधना

 


 

भीलवाड़ा । दशलक्षण पर्व के चौथे दिन दिगम्बर जैन समाज ने उत्तम शौच धर्म की आराधना की। शौचधर्म लोभ का प्रतिहार करता है। जैन दर्शन के अनुसार पूजा, तपस्या, साधना से किसी भी प्रकार के सुख, वैभव की कामना नही करना ही उत्तम शौच धर्म है। आर के कॉलोनी स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में सोमवार को शांतिलाल अंकित शाह परिवार ने 108 रिद्धी मंत्र से अभिषेक एवं स्वर्ण झारी से शांतिधारा की। बालयति निर्यापक मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने सौलह कारण भावना में शक्ति तप भावना पर प्रवचन में बताया कि कर्मो का क्षय करने के लिए मन, वचन, काया को तपाना ही तप है। जिस प्रकार दुध को गर्म करने के लिए बर्तन को तपाना पड़ता है, वैसे ही आत्मा की विशुद्धि के लिए शरीर के माध्यम से तप किया जाता है। तप शरीर को कष्ट सहने का अभ्यास करना है ताकि साधना के समय की प्रतिकूलता को सहन कर सके।
ट्रस्ट के अध्यक्ष नरेश गोधा ने बताया कि रविवार रात्रि संगीतमय बडी भक्तामर आरती का आयोजन हुआ, जिसमें श्रावक-श्राविकाओं ने मुख्य आरतीकर्ता कैशवलाल सुभाष हुमड परिवार के साथ भजन के साथ नृत्य करते हुए 48 दीप प्रज्जवलित कर आरती की।

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