भावना प्राणी को प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाती है- विद्यासागर महाराज

 


भीलवाड़ा । सौलह कारण भावना क्रम में प्राणी दर्शन विशुद्धिपूर्वक विनयवान बनते हुए तीसरी ’’निरतिचार शीलव्रत’’ भावना को धारण करता है। जैन दर्शन में हिंसादिक पापों से निवृत होकर अहिंसा, अचौर्य, सत्य आदि पालन करने को व्र्रत कहा गया है। इन व्रतों की रक्षा के लिए जो परिश्रम किया जाता है, उसे शीलव्रत कहा गया है। जिस प्रकार किसान अपने खेत की रखवाली के लिए बाढ़ लगाता है, उसी तरह जैन दर्शन में व्रत पालन की रक्षा के लिए शीलव्रत का महत्व बताया गया है। इस उद्देश्य से गृहस्थों के लिए सात शीलव्रत बताये गये है, जिनमें तीन गुणव्रत एवं चार शिक्षा व्रत होते है। साधु के लिए आठ प्रवचन मातृकाए, जो साधु के लिए रत्नत्रय पालन में माता के समान हितकारी होती है, बताई गई है। इसमें पांच समिति एवं तीन गुप्ती आती है। इनके पालन के लिए ही दिगम्बर साधु चार हाथ जमीन देखकर चलता है, हित-मित वचन बोलते हुए ईर्या समिति, भाषा समिति, एषणा समिति आदान निक्षेपन समिति आदि का पालन करता है। यह बात बालयति निर्यापक श्रमण मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने गुरुवार को सुधासागर निलय में निरतिचार शील व्रत भावना पर प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में 18 हजार शीलवृत बताये गये है, जो कि सम्पूर्ण रूप से चौदहवें गुणस्थान में केवली भगवान को होते है।
महाराज ने कहा कि यह भावना प्राणी को प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाती है। सांसारिक प्राणी पाप या पुण्य की कोई न कोई क्रिया करता रहता है। शुभ-अशुभ सभी क्रियाओं से निवृत होकर ही अपनी आत्मा में रम जाता है। जैन दर्शन में पहले अशुभ से छूट कर शुभ कर्म में लेने को कहा गया है। उसका प्रयोजन यह है कि शुभ में प्रवृत्त हुए बिना प्राणी शुद्ध में प्रवेश नहीं कर सकता है। व्रतों की आराधना का लौकिक दृष्टि से भी बहुत उपयोग है, जैसे खान-पान के संयम से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। इसलिए श्रावक को अपनी क्षमता के अनुसार व्रत अवश्य लेने चाहिए।

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